Monday, 14 September 2009

मगध की अद्भुत पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था : आहर - पईन - जोल

मगध क्षेत्र की ऐतिहासिक सांस्कृतिक गौरव और इसके अविछिन्न इतिहास का आधार इस इलाके की अद्भुत सिंचाई व्यस्था रही है.फल्गु , दरधा और पुनपुन मगध क्षेत्र की ये तीन मुख्य नदियाँ हैं. दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहमान ये नदियाँ कई शाखायों में बंटती हुयी ( दरधा फतुहा के समीप पुनपुन नदी में मिल जाती है ) गंगा में मिलती हैं. बराबर पहाड़ के बाद फल्गु कई शाखयों में बँट कर बाढ़ - मोकामा के टाल में समा जाती है . बौद्ध काल से हीं मगध वासियों ने सामुदायिक श्रम से फल्गु ,पुनपुन आदि इन नदियों से सैंकडों छोटी -छोटी शाखायें निकाली जिससे की बरसात में पानी कोसों दूर खेतों तक पंहुचाया जा सके . सामुदायिक श्रम से वाटर हार्वेस्टिंग की एक अद्भुत विधा और तकनीक का विकास ,सह्स्त्रवदियों से इस इलाके में होता रहा ,जो की ब्रिटिश शासन तक चालू रहा.फल्गु /पुनपुन के जल से आहर -पईन - जोल वाली विधा ने धान की खेती पर आधारित वह अर्थव्यस्था तैयार की जिसने मगध साम्राज्य , बौद्ध धर्म के उत्कर्ष ,और पाल कालीन वैभव और संस्कृति को जन्म दिया . सिंचाई की इस विधा की विकास प्रक्रिया ब्रिटिश हुकूमत के प्रारंभिक काल - परमानेंट सेटलमेंट - तक कम से कम चलती रही .औपनिवेशिक शासन काल में इस व्यवस्था में ह्रास शुरू हुआ और आजादी के बाद तो यह व्यवस्था अनाथ हो गयी. नए दौर की नयी हुकूमत , संवेदनहीन नौकरशाही और नये जमाने की सिविल इंजीनियरिंग ने इस कारगर सिंचाई व्यवस्था की ऐसी तैसी कर दी. मगध के ग्रामीणों की सुध बुध लेने वाला कौन था ?

मगध की इस ऐतिहासिक आहर - पईन - जोल की सिचाई विधा पर समुचित शोध अब तक नहीं हुआ है. नदी से चौडी मीलों लम्बी आहर खोदी जाती थी. आहर कई गाँव की धान के खेतों की सिंचाई की जरूरत को पूरा करती थी.आगे चल कर आहर छोटे छोटे चैनल्स में बाँट दी जाती थी .इन छोटी शाखायों को पईन कहते थे. आहर और पईन खोदते समय निकली मिटटी से अलंग बन जाता था जो की अतिवृष्टि में बाढ़ का सामना करने में सहायक होता था. भूक्षेत्र के केंद्र में गाँव और गाँव के चारों तरफ समतल मैदान में खेत ,मगध के ग्रामीण बसाहट की विशेषता है. मगध में खेतों के बड़े समुच्चय ( ५० से १००/२०० एकड़ रकबे ) को एक खंधा कहा जाता है. हर खंधे का अलग नाम होता है- मोमिन्दपुर, बर्कुरवा, धोबिया घाट , सरहद , चकल्दः , बडका आहर ,गोरैया खंधा आदि . समझने के लिहाजन खंधे को आयताकार क्षेत्र के रूप में लिया जा सकता है. अक्सरहां खंधे की चौहद्दी पर चौडी मजबूत अलंग , अलंग से सटे आहर - जिसमें नदी का पानी बड़े आहर से आता है. अलंग में पुल की व्यवस्था जिससे की जरूरत के मुताबिक खंधे में पानी लिया जा सके . खंधे के भीतर चौडे आहर , पतले पईन में बँट जाती है. पतली पईन नदी के पानी को खेत तक पन्हुचाती है.पईन में थोडी दूर पर करिंग चलने के लिए अन्डास निर्धारित होता है. अन्डास पर खम्भा - लाठा से करिंग नाध कर हर खेत में करहा ( छोटी नाली ) द्वारा खेत की सिंचाई होती है.गया जिले के दक्षिणी इलाके में हदहदबा पईन, कहते हैं की एक सौ आठ गाँव की सिंचाई करती है. बरगामा नामधारी पईन ( ऐसा पईन जो बारह गाँव को सिंचित करे ) तो लगता है की मगध के हर क्षेत्र में है.
जोल सिंचाई की इस व्यवस्था का अहम् हिसा रहा है. खंधे के नीचले हिस्से को जोल कहा जाता है. जोल एक तरह से खंधे की सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक reservoir ( छिछला जलाशय ) है. अलंग से सटा आहर ( चौडे आहर को खई भी कहते हैं ) और उससे सटे निचले खेत जोल का हिस्सा माना जाता है. जोल को खंधे का पानी का खजाना भी कहते हैं और इसमें धान की लम्बी और गहरे पानी को सहने वाली प्रजातियाँ लगायी जाती हैं. .खंधे के ऊँचे खेतों में तो धान की रोपनी होती है पर जोल में असाध माह में हीं बिचडे खेत जोत कर छींट दिए जाते हैं. धान की खेती के इस तरीके को बोगहा कहते हैं और बोगहे की खेती अगात ( शुरुयात ) खेती मानी जाती है. बोगहा की खेती में दर- मन ( प्रति एकड़ उपज )कम होता है अतः किसान इसे मजबूरी की फसल मानते हैं.


आहर - पईन - जोल वाली सिंचाई व्यस्था के संदर्भ में छालन और गुयाम - इनको समझना जरूरी है. छालन सिंचाई की वह व्यवस्था है जिसमें नदी का पानी आहर , आहर से पईन होता हुआ करहों ( छोटी-छोटी नालियों द्बारा ) सीधे धान के खेत में पंहुच जाता है.जैसे हीं धान के खेत में पानी पर्याप्त हुआ खेत में आने वाले करहे को बंद कर दिया जाता है.और इस तरह नदी का पानी बिना विशेष मेहनत के हर खेत में पहुँच जाता है. खंधे में पानी प्रयाप्त होने पर पुल का मुंह बंद कर दिया जाता है. छालन की इस व्यवस्था में नदी का पानी ,जमीन के स्वाभाविक ढलान या स्लोप से स्वतः पईन और करहों से होता हुआ खेतों तक पंहुच जाता है. लाठा कुण्डी, करिंग अथवा डीजल सेट की जरूरत नहीं पड़ती है. हर गाँव में कोई न कोई खंधा जरूर ऐसा है जिसके खेतों की सिंचाई छालन से हो जाती है.

गुयाम - सामुदायिक श्रम की एक व्यवस्था है जिसमें गाँव का हर आम-ओ -खास जरूरत पड़ने पर नदी में बाढ़ आदि की परिस्थिति में अलंग / तटबंध की सुरक्षा रात दिन करता है. गुयाम आपात परिस्थिति में आपसी सहयोग और समन्वय का एक अद्भुत उदहारण है.

उपर्युक्त विवरण को मगध की इस ऐतिहासिक आहर -पईन - जोल आधारित सिंचाई व्यस्था का एक प्रारम्भिक स्केच समझा जाय.
इस सिंचाई व्यस्था के कई सामजिक और सिविल इंजीनियरिंग पहलु हैं जिसकी समीक्षा और नए दौर की जरूरतों के अनुसार पुनर्स्थापित करने की जरूरत है.यह कहने की जरूरत नहीं की बिहार के विकास के लिए मगध क्षेत्र का विकास तथा मगध क्षेत्र के विकास के लिए कृषि और ग्रामीण विकास अनिवार्य है . और इस इलाके के कृषि के विकास की शर्त यह है की इस इलाके की पारंपरिक सिंचाई व्यस्था को बहाल किया जाय .

Wednesday, 9 September 2009

मगध में समेकित जल प्रबंधन - बाढ और सुखाड़ से निजात कब मिलेगा ?

बिहार के सन्दर्भ में बाढ़ की चर्चा अक्सर होती है. गत वर्ष की कोशी की भयावह बाढ़ की स्मृति अभी शेष है और कोशी अंचल उस प्रलय के पुनरागमन की आशंका से अभी नहीं उबरा हैं. पर बिहार और बाढ़ की चर्चा के दायरे में मगध क्षेत्र की बाढ़ और सुखाड़ की सालाना त्रासदी कभी चर्चा और सरकारी उद्दयम का केंद्र विन्दु नहीं बन पाता है. इस इलाके ( खास कर जहानाबाद , नालन्दा और पटना जिले के दक्षिणी इलाके ) के करोडों बदहाल ग्रामीण इस सालाना त्रासदी को अपनी नियति मान बैठे हैं.

हलाँकि इस साल अतिवृष्टि की वजाय अनावृष्टि का प्रकोप बिहार में ज्यादा रहा है. बिहार के किसान - खासकर मगध के - इस साल के सुखाड़ की तुलना सन १९६७ ( अकाल साल के रूप में जन मानस में जीवित ) के भयानक सूखे और अकाल से तुलना कर रहें हैं.फल्गु, पुनपुन और इनकी सहायक नदियों में आसीन ,माह तक इतना कम पानी ,चालीस- पचास साल में कभी नहीं आया .धान की रोपनी काफी कम हुयी. जैसे -तैसे डीजल सेट से मोरी को जिंदा रखा गया. असीम जीवट वाला मगही किसान बर्षा की उम्मीद में महंगे डीजल से धन रोपनी किया . लेकिन पुरे सावन भादो में कभी इतनी बारिश नहीं हुयी की धान की फसल के लिए प्रयाप्त हो जाए.बहुत इलाकों में वर्षा के अभाव में धान की फसल कड़ी धुप में जल गयी.

लेकिन मौसम का मिजाज देखें ,इधर पिछले सात दिन से कमो वेश पुरे मगध में झीनी झीनी
वर्षा ( झपसी ) हो रही है . धान के खेतों में काम लायक पानी हो गया है.जिन खेतों में धान की रोपाई नहीं हो पायी वहाँ अगात भिठा ( रब्बी फसल ) की तैयारी के लिहाजन भी यह झपसी फायदेमंद है.पिछले साल भीइस इलाके में बाढ़ का प्रकोप रहा था. सैकडो गाँव जलमग्न रहे . धान की फसल बाढ़ में बर्बाद हो गयी. अलंग और नदियों के सुरक्षा तटबंध ध्वस्त हो गए . सरकारी राहत जरूरत मंदों के बीच जरूर वितरित हुआ. किसानों को सोलह हजार रुपये तक फसल बीमा के तहत सरकारी सहायता भी मिली. राहत का अपना महत्व है और सरकारी राहत ने बाढ़ पीड़ित जनता का दुःख दर्द निसंदेह कुछ कम किया .पर बाढ़ का दंश सरकारी सहायता से आगे तक मारक असर करता है.

२००६ और २ ००७ में भी मगध क्षेत्र का यही हिस्सा बाढ़ से प्रभावित था .धन और आजीविका की व्यापक क्षति इस इलाके में लगातार चार - पांच सालों से हो रही है. लगातार बाढ़ और इस साल आसाढ़ ,सावन और भादो में सुखाड़ - त्रासदी से यह इलाका उबर नहीं पा रहा है.कल परसों से अचानक फल्गु ,पुनपुन और इन दोनों की सहायक नदियाँ और शाखाएं पुरे उफान पर है.नदियों का पानी इन के डूब क्षेत्र में फैलने लगा है. नदी तटबंधों पर पानी का भरी दबाव है . छोटानागपुर और हजारीबाग -इन नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र -में अगर और वर्षा होती है या तट बन्ध टूटते हैं तो पुरे इलाके में बाढ़ की आशंका है. हलाँकि अखबारों की शुरुयती रपट सैंकडों गाँव में फ्लैश फ्लड की बात कह रही है.

बिहार में विकास और आधारभूत संरचना के निर्माण की चर्चा , नीति निर्धारण और कार्यान्वयन में मगध क्षेत्र में ठोस दृघ्कालीन जल प्रबंधन की बात अब तक नहीं आई है.फल्गु , पुनपुन और इनकी सहायक नदियों और शाखायों में बरसाती पानी के समेकित प्रबंधन की जरूरत है.बिना इसके इस क्षेत्र के तीन करोड़ लोगों का जीवन खुशहाल नहीं बनाया जा सकता है.सनद रहे की मगध की इसी उर्वर भूमि ने वह आर्थिक आधार मुहैया किया जिसकी गोद में महान मगध साम्राज्य का उदय हुआ. जरूरत इस बात की है की इस इलाके की परम्परगत आहार -पयैन और जोल वाली व्यवस्था को नए सिरे से, नए जमाने की जरूरत के लिहाजन - सिविल इंजीनियरिंग की नवीनतम विधा और तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पुनर्स्थापित किया जाय.

पर आसन्न चुनौती यह है की बिहार की वर्तमान राजनीति और शासन व्यवस्था में मगध के जीवन मरण के इस प्रश्न को कैसे लाया जाय ?

Friday, 7 August 2009

मगध के ऐतिहासिक धरोहर की हिफाजत कौन करेगा ?

दैनिक जागरण , पटना के हवाले से एक खबर आई है . नालंदा जिला , हिलसा अनुमंडल के थरथरी प्रखंड के राजबाद गाँव में तालाब की खुदाई में प्राचीन भगनाव्शेष मिलाने की खबर आई है . कहने की जरूरत नहीं की इस की मुकम्मल पुरातात्विक उत्खनन और संरक्षण की जरूरत है . यूँ पूरा मगध क्षेत्र हीं गौतम बुद्ध की कर्म भूमि रही है ,पर इस क्षेत्र के गौरवमयी (बुद्ध काल ,मौर्य, गुप्त काल और पाल वंश के पांच सौ साल के शासन काल तक ) इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को द्रिघ्कालीन सुदृढ़ नीति बनाकर सहेजकर रखने और विकसित करने की जरूरत है .इस समाचार को विस्तार से पढें .

तालाब की खुदाई में मिले प्राचीन सभ्यता के avashesh

(नालंदा) Aug 06, 09:42 pm
जिले के हिलसा अनुमंडल के थरथरी प्रखंड क्षेत्र के जैतपुर पंचायत अंतर्गत राजाबाद गांव में सरकारी स्तर पर तालाब खुदाई के दौरान प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है। ग्रामीणों ने समझदारी दिखाते हुए मशीनों से हो रही तालाब की खुदाई रोक दी है और खुद कुदाल व फावड़े लेकर भग्नावशेषों को बिना क्षति पहुंचाये खुदाई करने में जुट गये है। कार्य की देखरेख कर रहे ग्रामीणों ने विशेष कार्य प्रमंडल के जूनियर इंजीनियर को इस बाबत सूचित कर दिया है लेकिन भग्नावशेषों को मिले दो दिन गुजर गये, अब तक कोई भी सक्षम पदाधिकारी स्पाट पर नहीं पहुंचे है। पुरातत्व विभाग भी इस प्रकरण से अबतक अनजान है। वैसे एएसआई के निदेशक एमजे निकोसे ने कहा कि अगर तालाब खुदाई में प्राचीन स्थापत्य कला के भग्नावशेष मिले है तो वह जल्द ही विशेषज्ञों की एक टीम राजाबाद गांव भेजेंगे। जो तमाम तथ्यों का बारीकि से मुआयना करेगी।बता दें कि राजाबाद अवस्थित तालाब की खुदाई विशेष कार्य प्रमंडल के अधीन हो रही है। खुदाई कार्य अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 9.75 लाख की इस कार्य योजना के तहत तालाब को 335 वर्ग फुट क्षेत्र में 7.5 फुट गहरा किया गया है। इसी क्रम में तालाब के पश्चिमी क्षेत्र में 21 फुट लंबा व 16 फुट चौड़ा चबूतरा मिला है। इस चबूतरे में लगी ईटे 14 इंच लंबी, 9 इंच चौड़ी व 2.5 इंच मोटाई की है। चबूतरा पश्चिम से पूरब की ओर झुका हुआ है। चबूतरे के उत्तर-दक्षिण लकड़ी का भीमकाय कालम भी है। इसके अलावा पानी में डूबा एक विशालकाय लकड़ी का खंभा भी है। जिसे ग्रामीणों ने मशीन के सहारे उखाड़ने की कोशिश की लेकिन खंभा टस से मस नहीं हुआ। फिलहाल इस खुदाई कार्य की देखरेख कर रहे संजय सिंह, पंचायत के पूर्व मुखिया श्यामनंदन शर्मा, ललन सिंह, बिन्दा प्रसाद व संतोष कुमार सहित कई अन्य लोगों के नेतृत्व में तालाब की खुदाई करायी जा रही है। ग्रामीणों को कुछ और महत्वपूर्ण अवशेष मिलने की संभावना नजर आ रही है।
Posted by Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना

Friday, 10 July 2009

मगध की पाल कालीन मूर्तियाँ - मूर्तिकला के विद्वान् की नज़र से

बिहार - बंगाल की पाल कालीन मूर्ति कला पर एक शोध ग्रन्थ " The Pala- Sena Schools of Architecture " -Sushan Huttington , में मगध की पाल कालीन मूर्ति कला और इस परम्परा के विभिन्न आयामों पर विशद चर्चा है.पोस्ट में दिए गए लिंक पर क्लिक करें तो इस क्षेत्र की मूर्ति कला की समृद्ध परंपरा की एक झलक मिलती है. शोध ग्रन्थ के अंतिम अध्याय ' Concluding Remarks " मगध की पाल कालीन मूर्तियों पर नए नज़रिए से शोध के महत्व को रेखांकित करता है. Shushan का कहना है की बिहार और बंगाल में पाल कालीन तक़रीबन छः हजार मूर्तियाँ इस क्षेत्र को मूर्तिकला के लिहाज़न दुनिया भर में चुनिन्दा स्थानों में शुमार कर सकती हैं. मेरा अनुमान है की सिर्फ मगध क्षेत्र के खेत , खलिहानों , तालाबों , टीलों , गाँव के मंदिरों और गोरैया स्थानों में इससे ज्यादा संख्या में मूर्तियाँ आज भी विद्यमान है.सनद रहे की मूर्तियों की यह संख्या इतिहास और काल के क्रूर हाथों से बचते - बचाते हुए , सामाजिक उपेक्षा ,तस्करी और चोरी के बावजूद बची हुयी हैं. इनमें से अधिकाँश मूर्तियाँ बिना सही पहचान के बरह्म बाबा , गोरैया बाबा और देवी मैया के रूप में इस इलाके में पूजी जा रही हैं.कहने की जरूरत नहीं की इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षण की जरूरत है. अगर जल्द यह कार्य नहीं हुआ तो सदा के लिए यह अनमोल विरासत काल कवलित हो जायेगी .

http://books.google.com/books?id=xLA3AAAAIAAJ&lpg=PA71&dq=satues%20of%20pala%20period&lr=&pg=PA201

पाटलिपुत्र -राजगृह प्राचीन मार्ग के पास बसे गाँव की प्राचीन मूर्तियाँ

I .
II.
III.
IV.

V.
खरभैया , पटना जिले के दनियावां अंचल में स्थित एक गाँव है.यह फतुहा हिलसा रोड के सिंगरिआमा स्टेशन से पांच किलोमीटर पश्चिम स्थित है .ऊपर में दी गयी मूर्तियाँ खरभैया , और उसके निकट वर्ती गाँव , छित्तर बिगहा , सरथुआ और तोप में अलग अलग समय में मिली हैं.
इनमें से कुछ मूर्तियों की पहचान आसान है पर अन्य की पहचान शेष है. तक़रीबन सारी प्रतिमाएँ खंडित है. इनमें से कुछ मूर्ति पहले से ही गाँव के देवी स्थान में संजोग कर रखी हूई हैं और अन्यमूर्तियाँ हाल- साल में तालाब और टीलों की खुदाई में अचानक मिली जिसे नया मंदिर बनाकर रखा गया है. जिन मूर्तियों की पहचान आसान है - जैसे उमा महेश्वर , उसकी पहचान और पूजा शंकर पार्वती के रूप में और अन्य मूर्तियों की पूजा ,गोर्रैया बाबा , बरहम बाबा और देवी माता के रूप में हो रही है.ये सारी मूर्तियाँ काले पत्थर में बनी हूई हैं और पाल कालीन प्रतीत होती हैं. पर इन मूर्तियोंकी जांच परख इतिहास और पुरातात्विक नज़रिए से होना बाकी है.

Saturday, 27 June 2009

मगध के आमा नामधारी गाँव और बौद्ध धर्म - सम्पूर्ण बिहार के परिप्रेक्ष्य में

मगध के आमा नामधारी गाँव और बौद्ध धर्म - सम्पूर्ण बिहार के परिप्रेक्ष्य में .

(- कौशल किशोर एवं अभिषेक कुमार )

बौद्ध युगीन प्राचीन मगध में पाटलीपुत्र से नालंदा होते हुए राजगृह ,तेल्हाडा और बोधगया ( तत्कालीन मगध के महत्वपूर्ण सत्ता और सांस्कृतिक प्रतिष्ठान )निसंदेह सामरिक महत्व के राजमार्ग से जुड़े रहे होंगें .सम्राट बिम्बिसार और गौतम बुद्ध के जीवन वृत्तांत से लेकर चीनी यात्री फाहयान और ह्वेन सांग के यात्रा वृतांतों में इन महत्व पूर्ण केन्द्रों के आपस में राजमार्गों से जुड़े होने का स्पष्ट उल्लेख है.और अगर राज मार्ग था तो फिर राजमार्ग के किनारे सराय , बौद्ध विहार , चैत्य और गाँव व नगर भी जरूर रहे होंगें .


इतिहास के उस काल खंड से निकल कर अगर वर्तमान में लौटें तो चुनौती इस बात की है कि क्या आज हम महत्वपूर्ण सामरिक और व्यापारिक राजमार्ग को दर्शा सकते हैं ?  


मगध का यह क्षेत्र ,पिछले ढाई हज़ार सालों में तमाम तरह के सामजिक , राजनैतिक , सांस्कृतिक परिवर्तनों से लेकर भौगोलिक परिवर्तन का गवाह रहा है. इस दौर में सबसे मह्त्व पूर्ण भौगोलिक / भूगर्भीय घटना रही है सोन भद्र नदी के प्रवाह में परिवर्तन . विशेषज्ञ कहते हैं कि पुनपुन नदी जो, वर्तमान में फतुहा में गंगा में मिलती है वह नौबत पुर ( पटना के दक्षिण - पश्चिम में )के आगे फतुहा में गंगा में मिलाने तक सोन नदी के पुराने रास्ते से बह रही है.सोन नदी जो आज कोइलवर में गंगा में मिलती है उसका प्राचीन प्रवाह और पूर्व दिशा से होता था और वर्तमान पटना शहर के बीच से होते हुए गंगा में मिलती थी. मगध की प्रमुख नदी फल्गु दक्षिण से उत्तर की और आने में कई शाखायों में बंट जाती है और इन शाखाओं का रास्ता भी इस काल खंड में बदलता रहा है.एक मायने में इन बुनियादी फेर बदल में अगर कुछ स्थिर रहा है तो यह कि प्राचीन मगध से ले कर वर्तमान युग तक भूगोल का यह हिस्सा ( मगध) तक़रीबन आबाद रहा है और यहां का इतिहास भारत वर्ष के इतिहास का अभिन्न हिस्सा रहा है.


 इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मगध साम्राज्य के दो सत्ता केन्द्रों ( पाटलिपुत्र और राजगृह)को जोड़ने वाले सामरिक / व्यापारिक राजमार्ग को चिन्हित करना एक multi disciplinary चुनौती है .


 अगर मगध के आमा नाम धारी गाँव प्राचीन बौद्ध बसाहट से सम्बंधित हैं , तो इस दिशा में विस्तृत विश्लेषण और पुरातात्विक अनुसंधान की जरूरत है.

फिलहाल अगर हम सिर्फ बिहार के सभी राजस्व गाँव के नामों का इस नजरिये से विश्लेषण करते हैं तो तस्वीर कुछ साफ़ होने लगती है.
बिहार प्रांत में कूल 45600 राजस्व गाँव हैं.एक राजस्व गाँव के दायरे में उसके कुछ टोले भी हो सकते है. सरकारी राजस्व रिकॉर्ड के तहत बिहार में कुल गाँव की संख्या 64000 के लगभग है . इन गाँव में कुछ बे- चिरागी ( निर्जन )गाँव भी हैं.

अगर बिहार के समस्त 45600 राजस्व गाँव के नामों का विश्लेषण किया जाय तो इस सन्दर्भ में कुछ मह्त्व पूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं.


पुरे राज्य में आमा नामधारी ( आमा प्रत्यय बाले गाँव - मसलन , दनिआमा , कछिआमा , घोसरामा , तेतरामा ) की कुल संख्या 831 है. 
इसमें से
391 गाँव सिर्फ मगध क्षेत्र में हैं .चंपारण और वैशाली ( मुजफ्फरपुर सहित ) में ऐसी गाँव की संख्या 73 है. इस प्रकार 831 में से 464 गाँव मगध ,वैशाली और चंपारण में हैं.यह कहने की आवश्यकता नहीं है की इन दोनों क्षेत्रों का बौद्ध धर्म और संस्कृति से अभिन्न सम्बन्ध था .मगध और वैशाली ,चंपारण के आमा नामधारी गाँव की विस्तृत जिलावार सूची निम्नलिखित है.

 Magadh                                                               

District Name      No. of Villages with            In % 

                                   aama suffix               ( of  total 831 villages )                                                                                

1. Sheikhpura                       7                                              0.84                                                  
2. Nawada                           38                                              4.57                                                      
3. Nalanda                           73                                              8.78
4. Patna                               64                                               7.7
5. Gaya                               109                                             13.11
6. Jehanabad                       38                                               4.81  
7. Aurangabad                     62                                               7.46  

Total                               391                                             47.27

Champaran & Vaishali 

1. Pashchim Champa          11                                               1.3
2. Purbi Champaran         14                                               1.68

3. Muzaffarpur                    28                                               3.24

4. Vaishali                            20                                               2.4

Total                                 73                                              8.62

जैसा की पहले लिखा गया था , इस सुराग को शोध में तब्दील करने का प्रयास जारी रहेगा. इसमें आपकी सहभागिता की अपेक्षा है.

- कौशल किशोर एवं अभिषेक कुमार 

           

Friday, 26 June 2009

मगध से प्राप्त इस मूर्ति को पहचानें


गौर से काले पत्थर की इस मूर्ति को देखिये .

यह मूर्ति पटना जिले के एक निर्जन टीले से मिली है.

टीले के पास हीं फल्गु की एक शाखा बहती है. 

किसकी मूर्ति है ? 

किस काल की है ? 

Thursday, 25 June 2009

मगध साम्राज्य की राजधानी राजगीर ( राजगृह ) में पुरापाषाण युग के भित्ती चित्र ( prehistoric rock painting)की खोज


नालंदा और मगध के बौद्ध कालीन इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्यों की खोज में दिलो - जान से लगे दीपक आनंद ने राजगीर की पहाडियों में प्राक- ऐतिहासिक काल की गुफा भित्ती चित्र को खोजा है.इस खोज की मुक्कम्मल छान बीन और इसके निहितार्थों पर विचार विमर्श जारी है. अगर इस भित्ती चित्र के बारे में प्रारंभिक -अनुमान ,विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरे उतरे तो यह मगध की ज्ञात ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भगवान् बुद्ध और चक्रवर्ती अशोक से कई हजारों साल पीछे धकेल देगा. इस खोज के लिए हम दीपक आनंद की काबिले तारीफ़ निष्ठा और लगन को सलाम करते हैं.
इस खोज की विस्तृत खबर ( हिंदी) पटना संसकरण में २६-हिन्दुस्तान -०९ में हैं . साभार हिन्दुस्तान , प्रकाशित खबर का लिंक यहाँ दिया जा रहा है.

http://www.hindustandainik.com/news/2031_2262101,0060.htm

पूरापाषाण कालीन इस भित्ती चित्र से सम्बंधित खबर ,चित्र सहित दैनिक जागरण , पटना में भी २६-०६-०९ को प्रकाशित हुयी है . प्रस्तुत है दैनिक जागरण से साभार ,समाचार अंश .http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_5574638.html

राजगीर के जंगलों में गुफाओं की श्रृंखला मिली
Jun 25, 09:35 pm

नालंदा (बिहारशरीफ) । पुरातत्व व कल्चरल टूरिज्म से जुडे़ लोगों के लिए अच्छी खबर है। राजगीर की पहाड़ी में नालंदा महाविहार से जुडे़ शोधकर्ताओं ने गुफाओं के श्रृंखला की खोज की है, जिसके 10,000 से 40,000 वर्ष पुराने होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इन गुफाओं में एक कलाकृति भी मिली है, जिसकी डेटिंग अभी तय नहीं की गयी है। नव नालंदा महाविहार से संबद्ध दीपक आनंद ने अपने सहयोगियों के साथ राजगीर-गया मार्ग पर स्थित पहाड़ियों में इसकी खोज की है। हालांकि इस रहस्यमय गुफा के सही लोकेशन की जानकारी आम नहीं की गयी है। जिसे सुरक्षा कारणों से जोड़ा जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर समय रहते इसके संरक्षण की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग सजग नहीं होगा तो इसके नष्ट कर दिये जाने का भी खतरा है। वैसे नव नालंदा महाविहार के निदेशक रवीन्द्र पंथ ने इसकी सूचना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भेजी है। जब तक उसकी टीम यहां आकर सर्वे नहीं कर लेती है, तब तक लोकेशन को गुप्त रखा गया है। खोजी दल के सदस्य दीपक बताते है कि इन स्थलों से कुछ पत्थर निर्मित भी मिले है। पत्थर पर उकेरी गयी कलाकृति के बारे में उन्होंने बताया कि ये हेमाटाइट पत्थर से घिसकर बनायी गयी कला है। जिसे 'पैल्यू' कहा जाता है। 'पैल्यू' कला प्री-हिस्टोरिक काल में कई बार मिली है। वैसे इस कलाकृति के बारे में विशेष जानकारी एएसआई ही दे सकती है। यह स्थान घने जंगल में खुली अवस्था में है। जो वर्षो से मौसमी मार को झेलता आया है। इन साइटों की खोज के विषय में पूछे जाने पर दीपक बताते है कि चीनी यात्री ह्वेंनसांग ने नालंदा जिले में कुल 36 साइटों का उल्लेख किया है। जिसमें अभी भी लगभग एक दर्जन साइटों की पहचान भी नहीं की जा सकी है। इनमें कल्पिनाका स्तूप संख्या 33 व 34, कुलिका की स्तूप संख्या 31 व 32 व इसके अलावा राजगीर फोर्ट के इर्द-गिर्द भी कई स्तूप है। जिसकी खोज आज भी अधूरी है। इन्हीं साइटों के खोज के क्रम में उक्त गुफाओं की श्रृंखला व कलाकृति मिली है। इस उपलब्धि से खोजी दल काफी उत्साहित है। दल का मानना है कि अगर पुरातत्व विभाग दिलचस्पी लेते हुए इसकी सही-सही डेटिंग व मैपिंग करे तो यह क्षेत्र निश्चित तौर पर कल्चरल टूरिज्म व कम्यूनिटी टूरिज्म को बढ़ावा दे सकता है। भ्रमण के लिए अच्छा साइट भी बन सकता है। इससे न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा बल्कि पर्यटन का भी विकास होगा।"

Monday, 22 June 2009

मगध के सैंकडों आमा नामधारी गाँव में बौद्ध कालीन इतिहास समाहित है

 
मगध क्षेत्र में सैंकडों गाँव हैं जिनके नामों में ध्वन्यात्मक साम्य ( फोनेटिक सिमिलरिटी )है. इन गाँव के नामों का अंत आमा शब्द से होता है. मानो आमा उपसर्ग रहा हो .ध्वन्यात्मक साम्य अगर चंद  गाँव के नामों में हो तो इसे एक इत्तेफाक माना जा सकता है .पर अगर ऐसे गाँव की संख्या सैंकडों में हो , ये सारे गाँव की बसाहट एक ख़ास तरह की हो ( टीला -mound )और तक़रीबन एक समूह में या सानिध्य में हो तो इसे संयोग मानना उचित नहीं लगता .

इस तथ्य को अगर मगध की ऐतिहासिक ,सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि के साथ जोड़ कर देखें तो यह एक समेकित शोध और विश्लेषण की मांग करता है.

अगर आप पटना से गया बरास्ता फतुहा ,हिलसा ,इस्लाम पुर , खिद्र सराय की यात्रा करें तो फतुहा के आगे आमा उपसर्ग वाले चार गाँव (चार स्टेशन - मछारिआमा ,दनिआमा ,सिन्गारिआमा ,डिआमा,) लगातार या क्रम बद्ध हैं.डिआमा से पूर्व दक्षिण दिशा में 4 km पर कछिआमा और हिलसा से एकंगर सराय के बीच में कोसिआमा .हिलसा से नालंदा ,बिहार शरीफ और राजगृह के बीच में ऐसे ढेर सारे गाँव हैं.पावापुरी के पास तेतरामा और घोसरामा के पुरातात्विक महत्व की ,उन्नीसवीं सदी में बेल्गर और अलेक्जेंडर कन्निन्घम तक ने पुष्टि की . तेतरामा और घोसरामा में बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं.

यह अलग बात है की इन दोनों जगहों का विस्तृत वैज्ञानिक उत्खनन होना बाकी है .

अब इन गाँव की बसाहट से अलग पाली भाषा के शब्द "आराम " पर गौर करें.  

द पाली इंग्लिश literature dictionary by Thomas William Rhys Davis and William Stede ें आराम शब्द का उल्लेख है 

आराम - a pleasure garden, a पार्क,a private पार्क given to Buddha aur the sangha for the benefit of the bhikhus where they meet and hold discussion about sacred and secular, a meeting place for the religious gatherings.
अर्थात बौद्ध मठों के आस पास की जगह ,उद्यान ,बसाहट ,विचार विमर्श का स्थल 

आमा उपसर्ग धारी मगध के ये वर्तमान गाँव बौद्ध विहार के उद्यान के परिवर्तित रूप हैं या इन्हें बौद्ध विहार के भग्नावशेष पर बसी बस्ती मानें .

तो क्या ये सारे गाँव किसी प्राचीन बौद्ध मठ के परिवर्तित् रूप हैं ?

क्या क्या छिपा हैं इनके नीचे ?

जितने प्रश्न उतनी संभावनाएं .

  • फिलहाल आमा उपसर्ग धारी मगध में स्थित वर्तमान गाँव की लिस्ट नीचे दी जा रही है.इन गाँव के बारे और कुछ ऐतिहासिक ,पुराताविक या भाषिक तथ्य उपलब्ध हों तो इस सुराग को शोध की शक्ल मिल सकती है.

    जिला पटना 
    1.कोरामा
    2.कुजामा
    3.मेह्दामा
    4.नगमा
    5.कोहामा
    6.पोआमा (मसौढी )
    7.बरामा ( गौरी चक के पूरव , दरधा नदी के किनारे )
    8.भेड्गामा ( गौरी चक के दक्षिण पूरव )

  • 9.मोरिआमा ( पभेडा- मसौढी रोड के दक्षिण )  
  • फतुहा 
  • 1 .नरमा ( फतुहा, पटना )
  • 2. मछारिआमा ( फतुहा )
  • दनिआमा 
  • सिन्गरिआमा ( दनियामा)
  •  जिला नालंदा 
  • 1.डिआमा ( कराय परसुराय ) 
    2.बेरमा ( कराय परसुराय )

  • 3 मेढ्मा ( कराय परसुराय )
  • चंडी 
  • 1. सिरनामा 
    2.बसनीमा

    3. गोनामा
  • 4.कोलामा 
  • हिलसा 
  • 1. कछियामा 
    २.कोरामा 
    3.नदमा ( हिलसा के पश्चिम )
    4.पिपरामा ( हिलसा के पश्चिम )
    5. कोरामा ( हिलसा के पश्चिम )

  • 6 .मोरियामा ( हिलसा के पश्चिम )
  • एकंगर सराय
  • 1. दूरगामा 
    2.कोशिआमा 
  • 3.ओरिआमा
  • 4.दनिआमा पेंदा पुर 
  • इस्लाम पुर
  •  1. बारह्गामा
  • परवलपुर
  • 1.अलामा
  • 2.सीनामा 
  • बिहार शरीफ 
  • 1.हरगामा
    2.तेतरामा
  • 3. घोसरामा 
  • रहूई
  • 1. उत्तर नामा 
  • अस्थामा 
  • 1.अस्थामा
    2.अमामा
  • 3.नोआमा
  • हरनौत  
  • 1.बस्नीमा
  • २.गोनामा
  • 3.कोलामा
  • जिला गया  
  • 1.धनगामा ( जहानाबाद )
    2.कुम्भामा ( जहानाबाद )
    3.कोरामा (घोसी )
    4. सोनामा (घोसी )
    5 .कचनामा (मख्दूमपूर)
    6. मूरगामा (हुलासगंज)
    7.नरमा (हुलासगंज)
     8.कोसमा ( रतनी फरीदपुर )
    9.नोआमा ( रतनी फरीदपुर )
    10.पतिआमा( रतनी फरीदपुर )
    11.चीडिआमा (अतरी) 
    12.निधामा (अरवल )
    13.कचनामा ( बेलागंज )
    14.दधमा ( बेलागंज )
    15.बम्झीमा ( कोंच )
  • 16.कूरमामा ( कोंच )
  • 17.अतिआमा ( मदन गंज ) 
  • पटना - 13 गाँव / नालंदा - २७ गाँव / गया - 17 गाँव 

The  complete list of villages (144)of Patna and Nalanda having Wan ( AAMAA) suffix

S. No. Village Code 2001   Village Name     CDB CODE          Comm. Dev. Block Name
1 02827300 Merhwan 0001 Karai Parsurai
2 02827500 Berawan 0001 Karai Parsurai
3 02828500 Diawan 0001 Karai Parsurai
4 02829200 Ariawan 0002 Nagar Nausa
5 02830200 Nagawan 0002 Nagar Nausa
6 02830600 Kachhiawan 0002 Nagar Nausa
7 02836000 Kolawan 0003 Harnaut
8 02838300 Phalhanwan 0003 Harnaut
9 02839800 Gonawan 0003 Harnaut
10 02840900 Bafniwan 0003 Harnaut
11 02842600 Sauwan 0004 Chandi
12 02846100 Birnawan 0004 Chandi
13 02846200 Sirnawan 0004 Chandi
14 02846500 kornawan 0004 Chandi
15 02854400 Uttarnawan 0005 Rahui
16 02860000 Dhanawan 0007 Sarmera
17 02860100 Parnawan 0007 Sarmera
18 02860300 Malawan 0007 Sarmera
19 02862800 Rajawan 0008 Asthawan 
20 02863300 Asthawan 0008 Asthawan 
21 02863700 Amanwan 0008 Asthawan 
22 02863800 Manpur Amanwan 0008 Asthawan 
23 02865200 Harganwan 0008 Asthawan 
24 02866200 Dumranwan 0008 Asthawan 
25 02866800 Shakranwan 0008 Asthawan 
26 02867100 Uganwan 0008 Asthawan 
27 02867300 Noanwan 0008 Asthawan 
28 02867700 Malanwan 0008 Asthawan 
29 02868700 Dumrawan 0009 Bihar
30 02868900 Lakhranwan 0009 Bihar
31 02869900 Nagman 0009 Bihar
32 02870400 Patuwana 0009 Bihar
33 02871500 Upranwan 0009 Bihar
34 02873500 Gonawan 0009 Bihar
35 02873800 Tetranwan 0009 Bihar
36 02874200 Hargawan 0009 Bihar
37 02875000 Meghi Nongawan 0009 Bihar
38 02875100 Uknawan 0009 Bihar
39 02875200 Mirpur Uknawan 0009 Bihar
40 02878400 Jhanwan 0010 Noorsarai
41 02883600 Kariawan 0011 Tharthari 
42 02884000 Mehtarwan 0011 Tharthari 
43 02884100 Berwan 0011 Tharthari 
44 02885800 Sinawan 0012 Parbalpur
45 02886100 Dhanawan 0012 Parbalpur
46 02886400 Alawan 0012 Parbalpur
47 02889800 Korawan 0013 Hilsa
48 02891900 Jogipur Malawan 0013 Hilsa
49 02892200 Bamhanthan Malawan 0013 Hilsa
50 02892900 Kapasiawan 0013 Hilsa
51 02894800 Barsiawan 0014 Ekangarsarai
52 02895000 Daniawan Paindapur 0014 Ekangarsarai
53 02895100 Paindapur Dainawan 0014 Ekangarsarai
54 02895400 Kosiawan 0014 Ekangarsarai
55 02897000 Boriawan 0014 Ekangarsarai
56 02897400 Dhurgaon 0014 Ekangarsarai
57 02897800 Dhangawan 0014 Ekangarsarai
58 02899500 Siriawan 0014 Ekangarsarai
59 02900000 Soniawan 0014 Ekangarsarai
60 02900100 Daniawan 0014 Ekangarsarai
61 02900900 Dhawan 0014 Ekangarsarai
62 02902200 Jamuawan 0014 Ekangarsarai
63 02904200 Baralgawan 0015 Islampur
64 02905100 Sonawan 0015 Islampur
65 02906000 Amnawan 0015 Islampur
66 02906500 Korawan 0015 Islampur
67 02909200 Chaurawan 0015 Islampur
68 02911500 Murgawan 0016 Ben
69 02912000 Arawan 0016 Ben
70 02912800 Babhaniawan 0016 Ben
71 02916100 Siwan 0017 Rajgir
72 02920500 Gorawan 0018 Silao
73 02921300 Maniawan 0018 Silao
74 02922000 Ghustawan 0018 Silao
75 02925100 Ghosrawan 0019 Giriak
76 02932300 Nagwan 0001 Maner
77 02934000 Chhitnawan 0001 Maner
78 02937800 Kothawan 0002 Dinapur-Cum-Khagaul
79 02938800 Gorgawan 0002 Dinapur-Cum-Khagaul
80 02940300 Mirchi Bhawanian 0003 Patna Rural
81 02941200 Sonawan 0003 Patna Rural
82 02947600 Budhgawan 0005 Phulwari
83 02948700 Koriawan 0005 Phulwari
84 02949100 Yakubpur Nagwan 0005 Phulwari
85 02950600 Tarwan 0005 Phulwari
86 02951400 Nadiawan 0005 Phulwari
87 02958900 Kujawan 0006 Bihta
88 02963200 Tanrwan 0007 Naubatpur
89 02965100 Gonawan 0007 Naubatpur
90 02965900 Ajawan 0007 Naubatpur
91 02966100 Korawan 0007 Naubatpur
92 02967800 Nagwan Khas 0007 Naubatpur
93 02968000 Tilhwan 0007 Naubatpur
94 02972800 Piprawan 0007 Naubatpur
95 02972900 Adampur Piprawan 0007 Naubatpur
96 02973400 Pitwans 0007 Naubatpur
97 02975900 Baigawan 0008 Bikram
98 02977400 Sarwan 0008 Bikram
99 02978900 Bauwan 0008 Bikram
100 02979900 Moriawan 0008 Bikram
101 02981200 Dorwan 0009 Dulhin Bazar
102 02981500 Narwan 0009 Dulhin Bazar
103 02983600 Soniawan 0009 Dulhin Bazar
104 02986500 Pijrawan 0010 Paliganj
105 02993900 Rampur Nagwan 0010 Paliganj
106 02996900 Bauwan 0010 Paliganj
107 02998600 Nisiawan 0011 Masaurhi 
108 02998700 Sarwan 0011 Masaurhi 
109 02999900 Poawan 0011 Masaurhi 
110 03000100 Ghorahuwan 0011 Masaurhi 
111 03000700 Koriawan 0011 Masaurhi 
112 03002200 Nahwan 0011 Masaurhi 
113 03007500 Rewan 0011 Masaurhi 
114 03008000 Bhaisawan 0011 Masaurhi 
115 03014300 Moriawan 0012 Dhanarua
116 03014400 Bhergawan 0012 Dhanarua
117 03015500 Nadwan 0012 Dhanarua
118 03017700 Milki Dewan 0012 Dhanarua
119 03017800 Dewan 0012 Dhanarua
120 03019100 Piprawan 0012 Dhanarua
121 03020600 Behrawan 0013 Punpun
122 03022300 Kalianpur Basiawan 0013 Punpun
123 03022500 Kalianpur Basiawan 0013 Punpun
124 03027000 Barawan 0013 Punpun
125 03035300 Bhergawan 0014 Fatwah
126 03036500 Narwan 0014 Fatwah
127 00000000 Daniawan 0000 
128 03038500 Singriawan 0015 Daniawan 
129 03038900 Singriawan 0015 Daniawan 
130 03039500 Daniawan 0015 Daniawan 
131 03043200 Kohawan 0016 Khusrupur
132 03049900 Asawan 0018 Athmalgola
133 03051600 Thamhawan 0018 Athmalgola
134 03052600 Ahranwan 0019 Belchhi
135 03056500 Bahrawan 0020 Barh
136 03056900 Nadwan 0020 Barh
137 03057500 Bhatgawanan 0020 Barh
138 03058200 Dhanwan 0020 Barh
139 03059600 Atnauwan 0020 Barh
140 03065000 Ahmadpur Bakawan 0021 Pandarak
141 03065600 Dhobhawan 0021 Pandarak
142 03065700 Bazidpur Thamawan 0021 Pandarak
143 03066300 Bakawan 0021 Pandarak
144 03069800 Jazira Mokama 0023 Mokameh

 
Note -The list of similar villages of nbring Gaya,Nawada,& Sheikhpura will be given in due course.

 

 

Tuesday, 16 June 2009

मगही में फारसी और उर्दू की चासनी - भाग 1


मगध बिहार में इस्लाम का शुरूआती ठौर रहा है.यहाँ आकर इस्लाम का रंग बदला और इसने मगध को भी कई मायनों में बदला.मध्ययुगीन पाली/प्राकृत/ मगही का पाला पड़ा अरबी,तुर्की और फारसी भाषा से . बोलियों, भाषायों और धर्मों के इस घालमेल में उर्दू और खड़ी बोली हिंदी की पैदाईश हुयी.वर्तमान मगही में फारसी और उर्दू के शब्दों की भरमार है .ज्यादातर फारसी शब्दों का मगही करण हो गया है पर बहुतेरे शब्द आज भी पुराने स्वरुप में मगही में जीवित हैं.भाषाई और शब्द विकास का अपना तकाजा होता है और तदनुसार वर्तमान में तक़रीबन हर आम मगही भाषी इन शब्दों का धड़ल्ले से रोजाना इस्तेमाल करता है. ऐसे हीं चंद शब्दों की बानगी प्रस्तुत है.शब्दों की यह फेहरिस्त सिलसिलेवार ढंग से देने की कोशिस की जायेगी .
उर्दू/फारसी शब्द - अर्थ मगही शब्द - अर्थ
आराम-देह - आराम दायक आराम देह - आरामदायक
आराम-तलब - आलसी आराम तलब - आलसी
आजुर्दा - नाखुश अजुरदा - नाखुश / खिन्न
आफत - विपत्ति आफत -- विपत्ति
आमद - आमदनी आमद - आमदनी
आनन-फ आनन - तत्क्षण आननफानन - तुंरत
आयंदा - आने वाला / अगला आइंदे - आगे से
इजारा - ठेका /अधिकार इजारा - ठेका
इजलास - कचहरी /अधिवेशन इजलास - कचहरी
एहतियात - सावधानी एहतियात - सावधानी
इख्तियार - सामर्थ्य /सत्ता/अधिकार अख्तियार - सामर्थ्य
अदना - तुच्छ / नीच अदना - तुच्छ/ छोटा
अराजी - भूमि/जमीन एराज़ी - जमीन/क्षेत्रफ़ल
अर्ज़ - भूमि /स्थान अरज - चौडाई /जमीन
असबाब- सामान असबाब - सामान
असामी - किसान /प्रजा असामी - रैयत / मातहत किसान

Saturday, 13 June 2009

मगह का एक महादलित टोला - मदारी चक मुसहरी ( दनियावां , पटना )



मगह का एक महादलित टोला - मदारी चक मुसहरी ( दनियावां , पटना ) 

मगह में मुसहरों की बस्ती को मुसहरी कहते हैं. और ये बस्तियां जिस राजस्व ग्राम के दायरे में अवस्थित होती हैं उस गाँव के नाम को मुशहरी शब्द को प्रत्यय बना इन बस्तियों की पहचान पूरी कर ली जाती है.यथा -जीवन चक मुसहरी, एरई मुसहरी.

तो सामने वाले चित्र में जो बस्ती दिख रही है वह है मदारी चक .सरथुआ के पूर्व में .मगह की मध्य कालीनसूफी परम्परा में मदारी और कलंदर सूफियों का अलग सिलसिला रहा है. पर मदारी चक का सूफी मत और उन सिलसिलों से क्या सम्बन्ध रहा है यह अब भूत काल की बात हो गयी है.

सन १९४७ के पहले इस टोले पर दो तीन मुस्लिम किसानी परिवार भी था. पर १९५० में उनके पलायन के बाद अब इस टोले पर खालिस मुसहर आबादी है. खेत -मजदूरी और सूअर पालन इनकी आजीविका का मुख्य स्रोत रहा है.आर्थिक और सामजिक तौर पर सबसे निचले पायदान पर .

घर आते जाते नदी पार करते हीं मदारी चक पर निगाह पड़ती रही है.इस बार मदारी चक अलग सा दिखा. इधर इनकी स्थिति में सुधार हुआ है.इनके बच्चे स्कूल जाने लगे हैं.इनके फूस के घर ईंट और खपरैल में बदल रहें हैं.सरकारी आवास योजना के तहत कई पक्के मकान भी दिखते हैं.ताड़ के पेडों के बीच में से झांकते खपरैल और ईंट के घर .

नरेगा की रोजगार योजना  निकटवर्ती सारे गाँवों में चालु हैं .और मदारी चक के लोग  उसमें लगे हैं.
तो फिर   मांगुर मछली और ताडी की बहार यहाँ भी है. 

मगह में मेरा गाँव ,नरेगा , क्षत -विक्षत पूल और " दिन रात भेल दुरगतिया हो भोला "


नरेगा के तहत काम करते मजदूरों की तस्वीर असली है.हाँ इसमें तसला जरूर नहीं दिख रहा है.पर सब कुछ दीखने और दिखाने की भी एक सीमा है. सब कुछ तो प्रायोजित तस्वीरों में हीं दिखता है.

अगर बात करें जो तस्वीर में दिख रहा है उसकी तो - ये बदहाल ,जीर्ण शीर्ण पूल ( मेरे ग्राम वासी इसे छीलका कहते हैं.) इस अंचल की बदहाली ,लोगों की बेबशी और सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता व उपेक्षा की कहानी कह रहा है.

सिंगरियामा रेलवे स्टेशन से खरभैया ,सरथुआ और इसके चार पांच टोलों के लिए रास्ता इसी पूल से होकर गुजरता है.अनुमान लगाएं की बरसात में जब पईन में पानी भर जाता होगा तो इस इलाके की बहु बेटियाँ और अन्य लोग इसे कैसे पार करते होंगें.

ऐसा नहीं था के शुरुयात से इस रास्ते की यही हालत थी .

सरकारी दस्तावेजों में अगर ढूंढा जाय तो ब्रिटिश काल में यह खरभैया - सिंगरियामा  , पटना जिला परिषद् की सड़क है.और सन १९४० से हीं रेलवे स्टेशन से खरभैया गाँव तक पत्थर के माइल स्टोन लग गए थे .अलंग से चौडी और हर जगह प्रस्तावित सड़क के लिए दोनों तरफ गैरमजरुया जमीन का प्रावधान . जानकार कहते हैं की १९४७ के बाद सड़क तो नहीं बनी पर इसकी मरम्मत के नाम पर हजारों लाखों का वारा - न्यारा पटना डिस्ट्रिक्ट बोर्ड करता रहा है. लोगबाग कहते हैं के अगर अंग्रेजी हुकूमत कायम रहती तो अब तक गाँव तक प्रस्तावित सड़क बन जाती .आखिर अंग्रेज बहादुरों ने हीं तो फतुहा इस्लाम पुर मार्टिन लाइट रेलवे , सड़क और मेरे गाँव तकप्रस्तावित सड़क के लिए  माइल स्टोन लगवाया था.

उतना पीछे से निकल कर चलिए हाल साल लौटते हैं."जंगल राज " के शुरूआती दौर में इसका निर्माण शुरू हुआ.पूरा होने के पहले हीं धाध(बाढ़) में टूट - फूट गया .और फिर उसके बाद हर साल बरसात में इस पूल और और इससे गुजरने वाले ग्रामीणों की दुर्गति निर्बाध चालु है.सुशासन के पिछले तीन साल में भी.

मैथिलि के मूर्धन्य कवि विद्यापति की एक कविता की मर्मस्पर्शी पंक्ति है " दिन रात भेल दुरगतिया हो भोला ".

महाकवि की ये पंक्तियाँ कितनी सटीक बैठती हैं मेरे गाँव के लोगों पर .

पता नहीं इन लोगों के दुर्गति के दिन कब ख़तम होंगें ?

हाँ इतना तय है की नरेगा जहां फिलहाल सिर्फ मिटटी के काम का हीं प्रावधान है उससे तो यह पूल नहीं बनसकता है .


Friday, 12 June 2009

मगह के मेरे गाँव में नरेगा ,तसले में मांगुर मछली , ताडी और मुर्गा भात


मेरे गाँव में कार्तिक पुनिया ( 2008) से नरेगा के तहत कार्ड धारी मजदूरों को तक़रीबन हर रोज काम मिल रहा है. मुखियाजी मन से गाँव -महाल में मिटटी दिला रहे हैं.

तीन चार साल से लगातार मेरे गाँव - महाल में बाढ़ आ रही है . धान की खेती को पुरे तौर पर बर्बाद करते हुए . अब तो शादी विवाह में बिध और मडवा पर दुल्हा दुल्हन पर लावा छीटने के लिए धान भी लोगों को मोल खरीदना पड़ रहा है. बड़े बूढों की मानें तो उनके याद में ऐसा पहली बार हो रहा है.

ऐसा नहीं है की फल्गु नदी की दो तीन शाखाएँ ( महत्मायीन , धोबा आदि ) , जो मेरे गाँव के इर्द गिर्द बहती है उसमें एक -ब -एक ज्यादा पानी आने /बहने लगा है , या के बारिश जोरदार होने लगी है . बाढ़ ,जिसे हम लोग धाधकहते हैं , का कारण कुदरती न होकर पुरे तौर पर सरकारी है.मगह में जमीन का ढाल आम तौर पर दक्षिण से उत्तर के तरफ है .नदियों का पानी उसी अनुसार बहता है .धाध से बचाने के लिए गाँव के सिवाने पर पारंपरिक तौर पर सामुदायिक श्रम से निर्मित ज्यादातर बाँध ( अलंग ) फलतः पूरब से पश्चिम की ओर है .2004 से फ्लड कण्ट्रोल कि सरकारी योजना के तहत मेरे गाँव में पुराने अलंग का मजबूती करण और चौडी करण हो रहा है .बाँध की कुल लम्बाई है 6 km . हर साल बिध के तौर पर चंद दिनों तक jcb मशीन से मिटटी भराई का काम होता है. पर हाय रे हमारे गाँव की किस्मत .इन पांच सालों में छः kmका फ्लड कण्ट्रोल बाँध/ जमींदारी बाँध का काम पूरा नहीं हो पाया. इसका परिणाम है के हर साल बाढ़ की बिभिषिका बढ़ती जा रही है . बाढ़ के पानी से तक़रीबन हर अलंग में बड़े बड़े खांध हैं. फलतः हर साल खांध को भरने की जरूरत है. फ्लड कण्ट्रोल बाँध इस बर्ष भी पूरा नहीं हुआ है.बाढ़ अनुमंडल के फ्लड कण्ट्रोल के इंजिनियर साहब से हमारे ग्राम वासी लगातार संपर्क में हैं. jcb मशीन भेजने का पूरा प्रयास उनके द्वारा जारी है बशर्ते की बख्तियार पुर तरफ का दबंग ठीकेदार इंजिनियर साहब की बात मान लें.
अभी -अभी फतुहा में विधान सभा के उपचुनाव हुए , संसदीय आम चुनाव के लगे बाद इस उपचुनाव तक हमारे गाँव में कई नेता ,विधायक और मंत्री आये और इस कार्य के सुशासन के इस जमाने में इतने दिनों तक लंबित रहने पर घोर आर्श्चय व्यक्त करते हुए अधूरे काम को जल्द पूरा करवाने का आश्वाशन दे कर चलते बने. गाँव में कल तक (११ जून ) कोई इंजिनियर , ठीकेदार , मशीन या मजदूर इस काम के लिए अभी तक नहीं पंहुचा है.लेकिन हमारे गाँव के भोले भाले किसान कितने आशावादी हैं, मशीन से खेत पटा कर मोरी दे रहें हैं. शायद दैवी कृपा से धान हो जाय .
हाँ नरेगा के तहत जोरदार काम हो रहा है. गुणवत्ता के लिहाज़न भी काम मोटा - मोटी ठीक - ठाक हो रहा है.अगर उपियोगिता और उपादेयता की बात करें तो निसंदेह काबिले तारीफ़.तक़रीबन सारी पगदंदियाँ बन गयीं .गाँव के हर तरफ से निकास बन गया . स्कूल पर जाने बाली आरी मजबूत पगडण्डी बन गयी है.बरसात में बच्चे और बच्चियां फिसल ने से बच जांएगी. .रास्ते और अलंग के इस काम से पईन की उड़ाही भी हो रही है. और इन सारे कामों में हमारे गाँव और टोलों के मजदूर हीं लगें रहे हैं. मशीन नहीं बल्कि सिर्फ मजदूर काम कर रहे हैं. ये सारा काम मुखिया जी खुद करवा रहे हैं.हमारे गाँव के मजदूर , कहें तो अब तक इतने खुशहाल कभी नहीं थे. मन से काम करने वाले मजदूर ,रोजाना 150 रुपये कमा रहें हैं.पीले , लाल कार्ड पर हर महीने चावल गेंहूँ भी बाजार से सस्ते दाम पर मिल रहा है.
तो इन डेढ़ सौ रुपयों का क्या हो रहा है ?
मजदूर और दलित बस्तियों में फेरी करने वाले हर रोज तसले में भर कर बेचने के लिए जिंदा मांगुर मछली ला रहें हैं . फारम वाली मुर्गी रोजाना उपलब्ध है . मछली , मुर्गा भात हर रोज चल रहा है.और बैसखा में ताडी की बहार अलग से .हर रोज मछली और मुर्गा भात कि खुराक से बहुतेरे इन मजदूरों से इर्ष्या मिश्रित भाव व्यक्त करते हैं.
और ज्यादा काबिल बनते हुए कहते फिर रहें हैं कि इन कि हालत इनके खाने पिने कि इन्हीं वजहों से नहीं सुधरती है .
कहने वाले कहते रहें .जलने वाले जलते रहें ,
नरेगा ,तसले में मांगुर , मछली भात , ताडी और भर पेट खाते अघाते मेरे गाँव के मजदूर , फिल हाल इतना सब एक साथ देने वाले को तहे दिल से शुक्रिया कह रहें हैं.

Saturday, 30 May 2009

'फस्सिल में ताडी की बहार' की प्रशंसा में, अपनी कहानी भी ...

'फस्सिल में ताडी की बहार' की प्रशंसा में, अपनी कहानी भी ...

आलेख : संजीव रंजन .

गंगा पार में ताडी का वह इकबाल नहीं जो उसे मगह में हासिल है. यह बात अलग है की मगह के लोग जब गंगा पार जाते हैं तो उन्हें वहाँ की ताडी पंसोर लगती है .और संजीव की जुबां में कहें तो बेमजा .गंगापार , ताड़ ,ताडी , फेंता ( कोआ ) और बचपन के इर्द गिर्द घूमता मनोरंजक आलेख .इसे पढें और लुत्फ़ उठायें.

'फस्सिल में ताडी की बहार' पढ़कर मन रस से सराबोर हो गया. देर तक जेहन में आखिरी पंक्तियाँ टपकती रहीं - 'ताडी मगह का बियर है जो फस्सिल में सरेआम बहता है. आप उन्जरी लगायें और पियें पेट भरकर, यह तरावट भी देगा और शुरूर भी जो इस धरती पर कहीं और नहीं'. मन हुआ कि तत्काल उड़ कर मिटटी की खुश्बुओं-वाली अपने देसी महफिल में जा पहुंचूं, उन्जरी लगाऊं और छक कर पियूं - और तरावट और शुरूर के मौज में वहाँ के कहकहों में डूब जाऊं ...


लेकिन इस कल्पना में एक पेच है - वह यह कि इस परम आनंद के लिए यह अनिवार्य होगा कि मैं गंगा पार ,उत्तर बिहार( कांटी ,मुजफ्फरपुर ), जहां मेरा गाँव व घर है, वहां न जाकर मगह के किसी रसिक दोस्त के यहाँ जाऊं, क्योंकि मुजफ्फरपुर या उस तरफ के किसी कस्बे या गाँव में किसी ने भी - वह सम्बन्धी हो, कि शुभचिंतक, कि आलोचक - अगर जो रस्रंजन करते मुझे देख लेता है तो मेरी खैरियत नहीं - मां पछाड़ खा गिरेगी, पिता की नाक कट जायेगी, ससुर मुंह दिखने लायक नहीं रह जायेंगे, बीबी कच्चा चबा जायेगी - खुलासा की मेरी दुनिया तबाह हो जायेगी. दक्षिण और उत्तर बिहार में ताडी पर इतना भेद मेरी समझ में नहीं आता है. कौशल जब कभी ताडी के महफिल की रस-भरी कहानियाँ सुनाते तब मेरे अन्दर का सर्वविदित आवारा पक्ष अपराधबोध में फंस जाता. अब मैं कौशल को कैसे बताता कि उनके इस रसिक परम मित्र को ताडी का कोई इल्म नहीं. मुझे खुद भी ताज्जुब होता है कि कमबख्त क्या कुछ नहीं किया, फिर ताडी क्यों नहीं पिया? मुझे लगता है कि यह दोष मेरा नहीं, उत्तर बिहार का है.

बहरहाल ताडी या या ताड़ के पेड़ से जुडी मेरी जो यादें और अनुभव है वह सब तब की हैं जब मेरी उम्र दस-एक वर्ष से ज्यादा नहीं रही होगी - तब मुजफ्फरपुर के जिस मोहल्ले में मेरा घर है वहां गिने-चुने घर थे, बाकी ज़मीन खाली थी जिसमे ढेर सारे ताड़ और खजूर के पेड़ थे. हर रोज सुबह और शाम को, दोपहर का मुझे याद नहीं, इकहरी काठी का लचकीला, सख्त काला आदमी, खाली बदन दिनचर्या की पिनक में निर्वेग भाव से ताड़ के पेड़ के पास आता, पैडों में फांस लगाता और देखते-देखते ताड़ के पेड़ के बिलकुल ऊपर पत्तों के बीच पहुँच कर खडा हो जाता, अपने कमर से फंसली निकालता और क्या कुछ करता यह मुझे तब पता नहीं चलता, फिर ताडी उतारता, कमर में लबनी को फिट करता और उसी कलाबाजी से नीचे उतर आता. मैं सम्मोहित उसे तब तक देखता रहता जब तक वह वहाँ से चला नहीं जाता. मेरे अलावा कुछ और बच्चे भी इकठ्ठा हो जाते थे क्योंकि अक्सर वह पेडों से लगे फलों को काट कर नीचे गिराता जिनके लिए बच्चों में लूट मच जाती. उन फलों को नारियल कि तरह काट कर भीतर से बेहद मुलायम हल्की मीठास-वाली चीज़ निकालते जिसे वहाँ के लोग-बाग़ 'कोआ' कहते हैं. मैं उस भगदड़ को असहाय देखता रह जाता, मेरे हाथ कभी भी कुछ भी न लगता. एक दिन बिलकुल सुबह के वक़्त, सूरज अभी तरीके से निकला भी नहीं था, कि वह पेड़ पर चढ़ता दिखा. मैं चुपचाप वहां आ पहुंचा - और संयोग कि धबाधब फल गिरने लगे. जब तक वह नीचे उतरता तब तक मैं दूसरी खेप घर पहुंचा आया था. उतर कर उसने मुझे एक नजर फलों को इकठ्ठा करते देखा और उसी निर्वेग भाव से अपने रास्ते चलता बना.

तीसरी खेप ले जकर जब मैं घर पहुंचा तो क्या देखता हूँ कि मेरा बड़ा भाई और मेरी छोटी बहन आश्चर्य और उल्लास में फलों को घेर कर खड़े हैं. थोडी हीं दूर पर पिताजी चेहरे पर रंच-भर विस्मय भाव लिए कुछ इस तरह खड़े थे जैसे मेरी प्रतीक्षा कर रहें हों. उन्होंने छूटते हीं पूछा - यह तुम क्या सब ले आया है? मैंने बगैर नज़र मिलाये कहा कि 'कोआ' है, और फिर पता नहीं कहाँ से हिम्मत और बुद्धि आ गयी कि कह बैठा - सुबह में खाने से बड़ा फायदा करता है. पिताजी हंसने लगे, फिर पूछा - किसने बताया कि बड़ा फायदा करता है? और इसको काटेगा कौन? यह विकट समस्या थी. इतने में माँ आ गयी. पिता ने कहा - देखो, क्या ले आया है! चूँकि मैं इस इस बीच माँ से अक्सर 'कोआ' का ज़िक्र करता था और बाज़ार में कई बार उससे 'कोआ' खरीदने की जिद कर चुका था, वह क्षण-भर में मेरे विकल इच्छा को समझ गयी. उसने पिताजी को हल्के में झिड़कते हुए कहा - अच्छा ठीक है, ज़हर नहीं ले आया है न , बहुत दिन से इसका मन भी था. फिर मेरी तरफ देख कर कहा - कोई बात नहीं. पिता ने फिर टांग अड़ाया - इसको काटेगा कौन? माँ ने तपाक से कहा - इसमें क्या है, थोडी देर में सिवचनरा इधर आएगा हीं, वह काट देगा. 

समस्या का समाधान तो हो गया लेकिन तसल्ली न हुई, इसलिए कि अभी छः-साढे छः का हीं वक़्त था और सिवचनरा नौ बजे तक आता था. दूसरा डर यह भी हो रहा था कि ऐसा न हो कि वह आये हीं नहीं, क्योंकि वह कभी-कभी नहीं भी आता था - सिवचनरा हमारे मुहल्ले का फ्रीलांस, औलराउंडर श्रमिक था जिसके योग्यता-विस्तार और खुश मिजाजी का जोड़ा नहीं था. बागवानी में शाक-सब्जी लगवाना हो कि पुचारा करवाना हो, कि बाज़ार से अच्छे क्वालिटी का ताज़ा मछली-गोश्त मंगवाना हो, या शादी-व्याह में न्योता भिजवाना हो, कि बदन का तोड़-कर मालिश करवाना हो - सिवचनरा का जवाब नहीं था. वह गीत गाता, लोगों से लुत्फ़ लेता, अपना काम बिलकुल तसल्लीबख्श पूरा करता जिसके एवज़ में लोग उसे मेहनताना के इलावा भोजन व चाय भी देते.

बहरहाल सात बजा, साढ़े-सात हुआ, सिलोन रेडियो पर पुराने फ़िल्मी गानों का बेमज़ा प्रोग्राम शुरू हो कर आठ बजे ख़त्म हुआ, लेकिन सिवचनरा न आया. उसके आने में अब भी घंटा भर का वक़्त था. तभी मुझे ख्याल आया कि वह काटेगा किस चीज़ से. मैंने मां से पूछा - मां ने कहा कि जाओ बगल-वाले के यहाँ से 'दाब' मांग कर ले आओ. 'दाब' लेने मेरी छोटी बहन भी मेरे साथ चल पड़ी. वहाँ पूछा गया की 'दाब' का क्या काम है. मेरी बहन ने किस्सा खोल कर रख दिया, और वहाँ के तीन और बच्चे हमारे साथ हो लिए - अब युद्ध क्षेत्र में बस नायक की कमी थी, वह कब आयेगा यही प्रमुख चिंता थी. वक़्त काटे न कट रहा था ... कि सिवचनरा दिखा, हम सब समवेत पुकार उठ्ठे. वह सीधा हमारे पास आया. मां भी बाहर आ गयी. आग्रह किया गया. उसने कहा - अभी त एकदम खिच्चा है. फिर छक्क- छक्क बीचो-बीच वह काटता गया - दोनों हिस्सों के बीच में सिहरता सम्पूर्ण पारदर्शक तरल - निकालने के बाद मटमैले गुलाबी आकृति में गिरफ्तार - मेरे आनंद का पारावार नहीं था - कामना पूरी हुई और मन भरा .

संजीव रंजन





Tuesday, 5 May 2009

फस्सिल में ताडी की बहार से आगे : मगध में ताडी महात्मय

प्रिय सुजीत ,आप का अनुमान सही है .ताडी के क्षेत्र में मेरी औकात , तमाम दुसाहसों के वाबजूद चखने से आगे नहीं बढ़ पायी है लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूँ की संवेदना की प्रमाणिकता की एक मात्र कसौटी सिर्फ भोग हुआ यथार्थ ही नहीं होता है .सीधे तौर पर न सही तो आप जैसे मित्रों की सोहबत में क्या - क्या देखा और सुना उन सबको वाचिक परंपरा में ही रहना ठीक है और उन सबका खुलासा व्यवहार कुशलता और नैतिकतता के दृष्टि कोण से भी उचित नहीं होगा .खैर आप के लेख की तारीफ़ में मुझे शब्द कम पड़ने लगते हैं.

जॉर्ज ए ग्रिएर्सन की 1885 में लिखित पुस्तक " बिहार का किसानी जीवन " ( Bihar Peasant Life - Being a discursive catalogue of the surroudings of the people of that province. By George ए. Grierson ) में ताड़ और ताडी पर विस्तृत जानकारी है.-
1. ताडी बेचने वाले को पासी कहते हैं.ताड़ वृक्ष पर चढ़ने के लिए पासी रस्सी के एक मजबूत फंदे का इस्तेमाल करता है जिसे मगध में पसगी या फंदगी कहते हैं. पेड़ पर चढ़ते समय पासी पसगी को पैर में फंसा लेता है जिससे उसके पैर बंध जाते हैं . उसके कमर में बारीक पर मजबूत रस्सी बंधी होती है जिस्ससे वह अपने शरीर को ताड़ में लपटे रहता है .कमर में बंधे रस्से पर वह तिरछे लटका रहता है और जेर्क से पेड़ पर ऊपर चढ़ता है . कमर में बेल्ट नुमा बारीक मजबूत रस्सी बंधी होती है जिसके पीछे में लोहे का एक या दो अन्कुसी (हूक) होता है . अन्कुसी में ताड़ के पेड़ पर से ताडी उतारने के लिए लबनी ( मिटटी के बर्तन )तंगी रहती है.उस लबनी को कमर में इस तरह लटकाए हुए वह पासी पेड़ पर ताडी उतारने के लिए सुबह शाम चढ़ता है.
2. ताड़ वृक्ष को काटने वाले औजार को हंसुली कहते हैं. पूर्व में इसी को हंसुआ कहा जाता है.
3. ताडी रखने के लिए मिटटी के लंबे गोल बर्तन को हथौना , तर कट्टी , और सारण में लबना कहते हैं. बेचने के लिए ताडी की मात्रा नापने हेतु मिटटी के छोटे बर्तन को मगह में नापा और सारण में नपही और दक्षिणी भागलपुर में बररिया और गोल्वाँ कहते हैं. ताड़ पेड़ के नीचे ताडी रखने के लिए पक्की मिटटी के बर्तन को बसना या तर कट्टी कहते हैं.
4.ताड़ वृक्ष को तार या ताड़ तथा इसके रस को ताडी कहते हैं. इस वृक्ष के दो प्रकार हैं- नर वृक्ष जिसमें रोयेंदार फूल ( बलूरी ) होता है उसे बल्तार ,फुल्तार , तिरहुत में फुल्दो और सारण में बलिहा कहते हैं.मादा वृक्ष जो फल धारण करते हैं उसे फल्तार और दक्षिण भागलपुर में फल्ला कहते हैं. मगध में ताड़ के फल को फेंता कहते हैं.ताड़ के नए और अपरिपक्व पेड़ को खंगरा कहते हैं. वसंत ऋतू में ताडी देने वाले पेड़ को बसंती और गरमियों में ताडी दें वाले को जेठुआ कहते हैं. घौदहा पेड़ सालों भर ताडी देता है. घौर बर्षा ऋतु में ताडी देता है.

ग्रिएर्सन साहब की पुस्तक में ताडी चर्चा के बाद लौटते हैं ताडी की बहार पर .
मित्र ,अगर मैं बचपन में लौटता हूँ तो ताडी के इर्द गिर्द काफी बातें याद आती हैं.पासी को घेर कर बगीचे में , अलंग पर और ताड़ के नीचे बैठे पियांकों के बीच मुझे चुपचाप बैठने का लम्बा अनुभव है .पीने वाले , ज्यादातर पडोसी गाओं के , राहगीर और दूधिये रहते थे . वे यूँ तो अक्सर मेरी उपस्थिति को नज़रंदाज़ कर अपने उपक्रम में मशगूल रहते थे . पर मुझ पर अतिरिक्त आर्श्चय मिश्रित आदर भाव रखते थे . अक्सरहां वे बड़े आदर से ताड़ पत्ते से बने दोने में मुझे ताडी पेश भी करते थे . ताडी का स्वाद से ,सच कहूं तो मुझे एक विकर्षण था पर उन पियांकों को बातों में मुझे बहुत रस मिलता था .

दुनियादारी की ढेर सारी बातें , आस पास के जन जीवन से ताल्लुकात कैसे और किस तरह से रखा जाता है , किस्स्गोयी की शैली और लोकगीतों का अनुभव , एक किशोर के तौर पर मैंने इन ताडी पियांकों के बीच ही प्राप्त किया .

इस बात का पहला अनुभव इन्हीं लोगों के बीच हुआ के इन पियांकों के बारे में समाज की राय और इनकी वास्तविक हकीकत में कितना मौलिक अंतर है. वेबजः दुनिया लोगों के बारे में किसी कैसी राय बना लेती है .

जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ पियांकों और पियांकी के ये किस्से मेरे लिए दुर्लभ होते गए . बजह बहुत मामूली - बाद में मेरी उपस्थिति को लोग नज़रअंदाज कर अपने उपक्रम में मशगूल रहने के वजाय बातचीत की दिशा ही बदल देते थे . मेरी उपस्थिति किस्सों की महफिल में व्यवधान पैदा करने लगी थी .मेरा मन आज भी पियांकों के उन किस्सों में डूबने का करता है .

मित्र , आप के लेख ने दूर से हीं सही उस माहौल और उन यादों को फिर से जीवित कर दिया .लोक लाज के दायरे में रहते हुए किस हद तक आप बीती को आप लिख कर साझा करने का निर्णय लेते हैं ,यह मैं आप पर छोड़ता हूँ , पर खुदा और आपके अजीज इस बात के गवाह हैं की आप की गठरी रसदार कथायों से भरी हैं .
ये दिल मांगे मोर.
अर्जी हमारी ,आगे मर्जी आप की .

Sunday, 26 April 2009

मगध की लोक संस्कृति में ताडी महात्म्य :फस्सिल में ताड़ी की बहार

आलेख : मित्र सुजीत चौधरी का / फस्सिल में ताड़ी की बहार 


( मित्र कौशल ने मगह क्षेत्र में ताड़ी पीने की सामाजिक परंपरा पर अपना आलेख लिखकर मगह के सामाजिक - सांस्कृतिक जीवन में ताड़ी, पासी जाति, पासीखाना और ताड़ी की सामाजिक मान्यता पर आपसी विचारों के आदान - प्रदान के लिए एक नया मंच खोला है. मैं जानता हूँ की कौशल जी ने ताड़ी चखने से ज्यादा कुछ नहीं किया है परन्तु उन्होंने ताड़ी को गैर-मगही नजरिये से ( जो ताड़ी को निकृष्ट मानता है ) बाहर निकालकर मगह की लोक संस्कृति में ताड़ी के महत्व को स्थापित किया है . चलिए उनसे उत्प्रेरित होकर मैं ताड़ी पर यह आलेख लिख रहा हूँ )

परदेस प्रवास में कभी-कभी मादरे-वतन की यादें आती रहती हैं. त्यौहार हो, बदलते मौसमों की खुमार हो या रिश्तों के हाल-चाल .... अपनी जमीन की खुसबू और उसकी खींच से हम मुक्त नहीं हो पाते. अब तो दूरसंचार का जमाना है . हरेक साल गर्मियों में हमारे मित्र गण दाऊदनगर से फ़ोन करते हैं की " ...फस्सिल (फसल का मगही अपभ्रंश ) ) आ गईल हऊ अऊर बगईचा में ताड़ी पिय थी और तोरा याद आवा हऊ " . इस साल भी फ़ोन आया औरफस्सिल की यादें तरोताजा कर गयीं. फस्सिल यानि गर्मियों के महीने जो बैसाख से शुरू हो जाती है और आसाढ़ के प्रारंभ तक चलती है. इन महीनों में ताड़ी का रिसाव तापमान के साथ -साथ बढ़ता जाता है. आसाढ़ के मेघ और बारिश की फुहारों से ताड़ी पनिया जाता है और इसकी मिठास बढ़ जाती है. अब तो ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी फस्सिल पर पड़ रहा है सुनते है गर्मी के बढ़ जाने के कारण फागुन- चैत से ही फस्सिल शुरू हो जाती है. 

मगध में ताड़ी के पेड़ काफी संख्या में पाए जाते हैं. पूरे औरंगाबाद जिले में हसपुरा के बाद दाऊदनगर का क्षेत्र ताड़ बहुल है. इसीलिये यहाँ की जनसँख्या में पासी जाति के लोग काफी हैं. उनका आर्थिक श्रोत ताड़ी और सिंघाडा (एक पानी में उगनेवाला फल ) होता है. फस्सिल के महीनों में उनका घर या ताड़ के बगीचों में उनकी अस्थायी झोपडी पासीखाना या ताडीखाना में तब्दील हो जाता है. लोग दस बजे सुबह
तक वहां पहुँच जाते हैं. tabtak सुबह की ताड़ी आ चुकी होती है और उसके रसपान से शुरुआत होती है ताड़ी पीने की. दुपहर तक दूसरा खेप आ जाता है जो काफी नशीला और ज्यादा खट्टा होता है . चखने में सत्तू , चना , घूग्नी, मूंगफली चलती है. जो लोग रेगुलर ग्राहक होते हैं उनके लिए भोजन का भी प्रबंध हो जाता है. शाम ढलते - ढलते एक और खेप आता है. ताड़ी पीने का यह दौर रात तक चलता है. अर्ध-रात्री की ताड़ी सबसे
जायकेदार होती है . दूसरी बात, ताड़ एक diocious plant है यानी नर और मादा पेड़ अलग अलग होते हैं. इसीलिये ताड़ दो तरह के होते हैं : बलताङ (नर) और फलताड़ (मादा) . फल्ताड़ की ताड़ी उतनी स्वादिष्ट नहीं होती. सर्दियों के दिनों की ताड़ी या अहले सुबह की ताड़ी अगर पी जाये तो स्वास्थ के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि ताड़ी में sucrose होती है और fermentation के कारण वह नशीला हो जाता है. मुझे याद है मेरे नाना जो डॉक्टर थे, यकृत के मरीजों को बाकायदा सुबह की ताड़ी पीने की सलाह दिया करते थे. 

हाँ मित्रों , फस्सिल में बगीचे पिकनिक स्पॉट में बदल जाते हैं. लोगों का हुजूम. क्या अमीर क्या गरीब. क्या उच्च वर्ण और क्या नीची जाति ले लोग. यह मयकदा सबों को मस्ती के एक धरातल पर ले आता है. गप-शप, विचार-विमर्श, देस-दुनिया की खबरें, गीत-संगीत. हाँ ताड़ी पीने या रखने का पैमाना भी होता है : चुक्का , पंसेरा, लबनी और सबसे बड़ा घडा. अगर जमात बड़ी हो और पीने का दौर लम्बा हो तो एक-दो लबनी काफीहोती है. ताड़ी पीने के लिए पासी ताड़ के पत्तों से दोनी बनाकर देता है जिसमे ताड़ी पीने का अलग ही अंदाज होता है. 

मैंने सबसे पहले ताड़ी अपने पडोसी " गुप्तवा " जो जाति का भङभूँज़ा था , उसके घर में पिया . फस्सिल में घर में ताड़ी लाना और पीना आम बात थी और उस तबके के लोगों में स्त्रियाँ भी ताड़ी पीती हैं. जो लोग वृद्ध थे और उनका घर के बाहर आना - जाना मुश्किल था या वे लोग जो बगीचे या पासीखाने में जाना अपनी शान के खिलाफ मानते उनके लिए पासी घर में ताड़ी दे जाता मगर ताड़ी पीने की परंपरा सर्वव्यापी थी. 

जब मैं बड़ा हुआ और अपनी दोस्तों की मंडळी बनी तो एक मित्र जो ताड़ के बगीचे के मालिक थे और डोमन चौधरी को ठीका देते थे उसीके घर में जो बगीचे के नजदीक थी वहीं हम रोज़ ताड़ी पीते थे . खाना खाने दुपहर में घर आते , खाना खाकर थोडा सोते और शाम से देर रात तक ताड़ी का दौर चलता. हम गाना गेट, कवितायेँ सुनते- सुनाते, नाटक खेलने की योजना बनाते, गंभीर चर्चाएँ (जिसमे कार्ल मार्क्स के विचारों पर भीबातें होतीं ) करते थे. 

डोमन चौधरी का ताडीखाना को हमने लबदना युनीवर्सिटी कहते थे जिसके वाइस चाँसलर खुद दोमन चौधरी हुआ करते थे और हम उनके छात्र थे. डोमन चौधरी हमारे लिए सबसे अच्छे ताड़ की ताड़ी और विशिस्ट चखने का इंतजाम करते. हरेक बगीचे और अलग अलग पेडों की ताड़ी की अलग अलग तासीर और स्वाद हुआ करता था और आमतर लोग किसी खास बगीचे या किसी खास पेड़ की ताड़ी ही पीना पसंद करते थे. 

ताड़ मगह का बियर है जो फस्सिल में सरेआम बहता है आप उन्जरी लगायें और पियें पेट भरकर , यह तरावट भी देगा और शुरूर भी जो इस धरती पर कहीं और नहीं ! 











Tuesday, 21 April 2009

" ताडी पियो तरन भयो , सुखी भयो संसार "

" ताडी पियो तरन भयो , सुखी भयो संसार "  

यूँ तो पटना बिहार राज्य की राजधानी है पर यह अपने मूल चरित्र में - खास कर शहर का पुराना हिस्सा - मगही शहर है.तो जाहिर है की शहर मगही लोक संस्कार और रंग -ढंग में ओत -प्रोत होगा .

मगही लोक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है , चैत , बैसाख और जेठ के महीनों में बाग , बगीचों , खलिहान और ताड़ के पेडों के इर्द - गिर्द पियाकों का मजमा . ताडी के इस मजमें को आप इस मौसम में मगह के गाँव , कस्बों से लेकर पटना शहर के भीतरी न सही पर बाहरी इलाकों तक में देख सकते है.एक बात और , मगह क्षेत्र में ताडी और इसके चाहने वालों को उस नीची निगाह से नहीं देखा जाता है जैसा की गंगा पार में नजरिया है.

करीब करीब पूरा मगध क्षेत्र ताड़ के पेडों से भरा हुआ है. ग्रामीण इलाकों में बैसाख के मध्य तक ग्रामीण जन खेती बारी के काम से निवृत हो जाते हैं . लगन , माने के शादी व्याह की शुरुयात हो जाती है. लोग बाग़ अपने बचे खुचे सामजिक काम करते है. 

यह मौसम लोगों की जुबान में कहें तो बैठा - बैठी का समय है. खेती के काम से फुरसत .मानसून के आने तक खेती का अमूमन कोई काम नहीं.ताड़ के पेड़ घौद से लड़ने लगते हैं.बलुरियाह और घौदहा दोनों तरह के ताड़ के पेडों पर लबनी टंग जाती है और पासी सबेरे शाम ताड़ से ताडी उतारने का क्रम शुरू कर देता है.मौसम जैसे जैसे तपता है ताडी की मात्रा और मादकता बढती जाती है.

अगर आप पटना से गया बरास्ता मसौढी , जहानाबाद या फिर फतुहा हिलसा इस्लामपुर , नवादा बिहारशरीफ किधर को भी निकल जाएँ , ताडी के मतवालों की भीड़ ताड़ पेड़ के इर्द गिर्द बाग़ बगीचों में बैठी मिल जायेगी.
उस समूह में आप बिअत्हें तो दीं दुनिया जहान की बातें ये ताडी प्रेमी करते मिलेंगें. बात चीत के दायरे में सब कुछ. इस साल तो चुनाव का मौसम है . शासन सुशासन से लेकर नीतीश , लालू , पासवान , सोनिया , अडवाणीजी सब की चर्चा होती होगी. घर - परिवार ,शादी - विवाह ,आस - पड़ोस , दोस्ती - दुश्मनी , और हाट - बाजार सब पर विचार मंथन होता है.

किस्सागोई अगर सीखना हो तो आप इस तरह की किसी मंडली में बैठें .बहुजन - हिताय और बहुजन -सुखाय विमर्श को ,ताडी के मादक रस में , होते अनुभव करना चाहते हों तो मगह क्षेत्र में बैसाख के इस लोक उत्सव में शामिल हों .

शर्त के साथ मैं यह कह सकता हूँ की लोक मंगल की भवन में आपका जरा भी विश्वास है तो एक बार के बाद आप पुनः पुनः इस लोक रंग में भींगना चाहेंगें .



Thursday, 12 March 2009

फल्गु नदी से गया शहर का नज़ारा , इसवी सन 1824



 
तीर्थ नगरी गया फल्गु नदी के ओर से .शहर का मनोहारी दृश्य .ईस्ट इंडिया कम्पनी के पटना के ओपियम एजेंट ,सर चार्ल्स डी ओइली द्वारा 1824 में कलम और स्याही में बनायी गयी एक कला कृति . साभार ब्रिटिश लाइब्रेरी ,लन्दन
 

Sunday, 8 March 2009

एक खबर - प्राचीन गढ़ के अवशेष मिले नालंदा जिले के गाँव में

( दैनिक जागरण , पटना के सौजन्य से एक खबर .)
चंडी व इस्लामपुर में मिलीं पालयुगीन मूर्तियां
Mar 09, 12:21 am
बिहारशरीफ जिले के इस्लामपुर व चंडी प्रखण्ड में पुरातत्व विभाग की टीम को कई महत्वपूर्ण स्पाट मिले है। इनमें अनुमानत: छठी से सातवीं सदी के किले व मंदिरों के अवशेष तथा हिन्दू व बौद्ध धर्म के आराध्य देवों की प्रतिमाएं शामिल है। एक वर्ग कि.मी. में फैले मिट्टी के गढ़नुमा अवशेष को ले पुरातत्व विभाग विशेष उत्साहित है। पकी मिट्टी से बने स्थापत्य व मूर्तिकला के नमूने इसके पाल युगीन होने की ओर इशारा कर रहे है। इन प्राचीन अवशेषों की स्थिति बेहद सोचनीय है। संरक्षण के अभाव में मूर्तियां व भग्नावशेष इधर-उधर बिखरे पड़े है।
इस्लामपुर प्रखंड के इचहोस गांव में बुद्ध विहार तथा मंदिर के दरवाजे व स्तंभ मिले है। जो स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने हैं। इसी प्रखण्ड के वेश्वक गांव में मिट्टी के किले का अवशेष मिले है। जिसके निर्माण काल का अंदाजा छठी व सातवीं सदी लगाया जा रहा है। किले के चारों तरफ बुर्ज, मिट्टी की चहारदीवारी तथा पाल कालीन हिन्दू व बौद्धिष्ट मंदिर के अवशेष स्पष्ट दृष्टिगोचर है। इस क्षेत्र को सुरक्षित रखने की बजाए स्थानीय लोगों ने कब्रिस्तान के लिए अतिक्रमित कर लिया है। इस्लामपुर के ही मुबारकपुर में हिन्दू देवी-देवताओं की पाल कालीन और बौद्ध कालीन मूर्तियां मौजूद है। इनमें बुद्ध, तारा, अवलोकितेश्वर, विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, ब्रह्मा, वाराह व शिव-पार्वती की प्रतिमाएं है। चंडी प्रखण्ड के जैतीपुर मोड़ से चार किमी पश्चिम रूखाईगढ़ में एक वर्ग कि.मी. में फैले 30 फीट ऊंचाई के विशालकाय गढ़ के भग्नावशेष विद्यमान है। यहां पकी मिट्टी की कई प्रतिमाएं भी मिली है। पुरातत्वविदों का कहना है कि यहां मौर्य काल से पहले पाल कालीन (10वीं शताब्दी) की सभ्यता के अवशेष मिलने की प्रबल संभावना है। इसी प्रखंड के तुलसीगढ़ में एक विशालकाय स्तूपाकार संरचना है। जिसकी ऊंचाई लगभग 30 से 35 फीट व व्यास लगभग 60 मीटर है। आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की टीम को शोध के अनगिनत पहलू मिल चुके है। अब पुरातत्वविदों ने इन सभी संरचनाओं के संरक्षण की जरूरत बतायी है। खोज में जुटी एएसआई की टीम ने राज्य सरकार से इन क्षेत्रों की घेराबंदी की मांग की है।
बता दें कि उपरोक्त सभी स्थलों का निरीक्षण भारतीय पुरातत्व शाखा तीन के अधीक्षक एन.जी.निकोसे ने निर्देश पर किया गया। निरीक्षण में घोड़ा कटोरा में खुदाई कार्य कर रहे पुरातत्वविद डा. सुजीत नयन, डा.जलज तिवारी व आशुतोष शामिल थे।

Saturday, 7 March 2009

1895 में गया शहर - एक नज़ारा


शहर की मुख्य सड़क , चौडी और साफ़ सुथरी 
अलग - अलग शैली और स्थापत्य में बने मकान ,
दूसरे पहर की सुहानी धुप में नहाया खूबसूरत मंदिर 
राहगीर और उनकी वेशभूषा 
सब के सर पर मुरेठा ,
 खुशहाल दिखते लोग . 
पहली नज़र में तबीयत प्रसन्न करने वाली तस्वीर 
आप और कुछ ढूंढ पाए इस तस्वीर में ?
कितना बदला है गया बाद के सौ सालों में ?
क्या - क्या बदला आते जाते लोगों में ?
लिखें तो विमर्श आगे बढेगा .


होली की यादें - दाऊदनगर की

  ( सुजीत चौधरी - होली की यादें दाऊदनगर की .दाऊदनगर इस कथा को शायद सुजीत से बेहतर कोई और नहीं कह सकता.)
हरेक साल फागुन में एक खास खुशबू भरा हवा का झोंका मुझे यह एहसास दिला जाता है की होली आने वाली है । इस हवा के झोंके में एक खास खुशबू होती है , आम के परिपक्व मंजर, नीम के फूल और न जाने किन किन फूल पत्तों की। मैंने इस खुशबू के झोंके को दिल्ली, चेन्नई , मुंबई और बंगलोर में महसूस किया है। यह झोंका अपने साथ बचपन की होली की यादें ले आती है। मुनीर नियाजी के ग़ज़ल का एक शेर याद आ जाता है जिसका वातावरण तो अलग है लेकिन भावना समान है, " लाई है फिर उड़ाके गए मौसमों की बास , बरखा की रुत का कहर है और हम हैं दोस्तों , उस बेवफा का शहर है और हम हैं दोस्तों।"

यह फागुनी बयार और इसकी बास मेरे मन को गुदगुदा जाता है , जेहन को सहला जाता है और ऐसा लगता है जैसे किसी ने अपने नर्म हथेलियों से मेरे गालों पर गुलाल मल दिया हो। साथ ही याद आ जाती हैं दाऊद नगर की होली की स्मृतियाँ । वसंत पंचमी के बाद मुहल्ले में शाम या रात को कुछ लोग होरी गाना शुरू कर देते थे। ढोलक और झाल बजता । इसमे कृष्ण और राधा और बृज का उल्लेख होता था। फागुन कृष्ण पक्ष के दूज के दिन अगजा (होलिका दहन का स्थान ) को विधिवत स्थापित किया जाता था । उस स्थान पर रेड़ के पौधे (अंगरेजी में केस्टर ) को लगाया जाता था। उसके बाद हम बच्चे घर-घर घूम कर लकड़ी माँगा करते थे । मज़े की बात है की हम लकड़ी चुराया भी करते थे और यह मान्य था। रात को मेरे घर का नौकर पहरा देता था की कोई हमारे घर का गेट न चुरा ले जाए। मैंने सुना था की एक बार होली में हमारा गेट अगजा की आहुति बन गया था ।। मुझे याद है की दिन दहाड़े हम लोग एक पुरानी हवेली जिसका मालिक नहीं था और हवेली खंडहर में तब्दील हो चुकी थी , उससे बड़ी बड़ी शहतीरें चुरा लाये थे । हमने बड़े मुश्किल से अपने नन्हे कन्धों पर उन शहतीरों को झेला था ।
जैसे जैसे होली नजदीक आती , होरी के गीतों का लहजा और विषय बदल जाता । " बिरज में होली खेलें कान्हा " से " गोरी ऐसी पातर , जैसे लचके लवंगिया के दार ।" फागुन पूर्णिमा के शाम या रात (मुहूर्त के मुताबिक ) अगजा जलाई जाती थी । इसमे मांगी और चुराई छुपाई गयी लकडियों के साथ खरीब की फसल जैसे मटर, गेहूं , चना भी जलाये जाते और उसे प्रसाद की भावना से खाया जाता था। कुछ लोग , जिनके परिवार में किसी को मिर्गी जैसी मर्ज़ या भूत प्रेत की छाया की आशंका रहती वे आंते की लिट्टी / रोटी बनाकर लाते और अगजा में उसे जलाकर रोगी को खिलाते । इतनी पावन थी अगजा की आग !
अगजा में जली वस्तुओं की राख से शुरुआत होती धूर-खेल । लोग उस राख को एक दूसरे को लगाते और सुबह तक यह खेल मिटटी कीचड में विकशित हो जाती।
कीचड से होली की शुरुआत होती फिर हम नहाते और फिर रंग भरी होली शुरू होती। तरह तरह के रंग ! एक दानेदार रंग आता था जिसे हथेलियों में थोड़ा सा पानी मिलाकर गालों पर लगाया जाता था जिसे छुटने में कई दिन लग जाते । हम उसे एस्ट्रा कहते थे। बाज़ार में जब एनामेल आया तो लोगों ने सिल्वर / गोल्डन रंग का इस्तमाल शुरू किया । इसे छुटने के लिए स्पिरिट या केरासिन तेल की जरूरत होती। जब सूरज पूरा जवान हो जाता और दोपहर ढलने को होती तो हम घर लौटते । हर साल की तरह बुरे रंगों से होली खेलने के लिए फटकार पड़ती । शाम को हम कुरता पजामा पहन गुलाल से होली खेलते । लोग एक दूसरे के घर जाते , मिलते , खाते पीते। हाँ , भंग भोग सुबह से ही शुरू हो जाता था । जब शहर में इकलौती ' अंग्रेज़ी शराब की दूकान " खुली, तो विदेशी का भी प्रयोग शुरू हुआ। खाने में मांस , कटहल और ओल की सब्जी , दही वादा और घुग्नी परोसे जाते । कुछ खट्टा भी जिससे नशा उतरे।

दूसरे दिन दाऊद नगर में होता ' झूमता ' ।
झूमते के दिन हरेक मुहल्ले में तैयारी होती झुंड बनाने , रंगों के लिए बड़े पात्र जैसे ड्रम , पीतल की बड़ी बड़ी पिचकारियाँ और बैल गाड़ी । एक मुहल्ले का झूमता सारे मुहल्लों से गुजरता जैसे विभिन्न मुहल्लों के बीच प्रतियोगिता हो रही हो ।। कौन किस पर कितना रंग डाले ! अगर सड़क या गलियों में आमना सामना होता तो जैसे रंगों से मार ! मुहल्लों से गुजरते हुए हम उन मुहल्लों में रहने वालों खास कर छतों - मुंडेरों पर इकट्टी नारियों से होली खेलते । वे ऊपर से हम पर पानी डालतीं और हम नीचें से पिचकारियों की धार से वार करते । हम सारा दिन भींगते हुए होली खेलते और हमारा सफर बाज़ार पहुंचकर ख़त्म होता जहाँ सभी झूमता इकट्ठा होते। भंग का नशा अपनी पराकास्था पर होता । लोग एक दूसरे का कपड़ा फाड़ते , गले मिलते और होली गाते , " अंखियाँ भईल लाले -लाल , एक नींद सुते दे पतोहिया " या " जोगीरा सररर आ रा रा रा रा " जिसमे मजाक और अश्लील बातें होतीं ।

होली और झूमता के बाद कई दिनों तक नशे का शुरूर रहता और बदन -चेहरे पर रंगों की लज्ज़त । हम फिर इंतज़ार करते अगले साल की होली की ।। अब तो वह होली ही नहीं , उसकी यादों से होली मनाते हैं । गालिब का शेर याद आता है , " ....अब वो रानाईये ज़माल कहाँ , वो शबों - रोजों माहो साल कहाँ .....फिक्र्रे दुनिया में सर खपाता हूँ , मैं कहाँ और ये बवाल कहाँ ।"


( होली की इन स्मृतियों को पुनर्जीवित करने में दाऊद नगर के मित्र प्रिय गणेश जी ने मदद की। मित्र संजीव ने भूले बिसरे शेरो को याद दिलाया । उन्हें धन्यवाद ! सबों को होली की शुभ कामनाएं ! )